Behera Murder Case: क्या सच में काटकर खा गया था नेता का हाथ? पूरा गांव आज भी खौफ में!

Behera Murder Case

Behera Murder Case : ओडिशा के ढकोटा गांव में 25 मार्च 2019 की रात को जो हुआ, उसने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया। कांग्रेस के पूर्व नेता और गहसिपुरा ब्लॉक के चेयरमैन रहे रामचंद्र बेहरा की नृशंस हत्या ने न केवल राजनीतिक माहौल में सनसनी फैलाई, बल्कि न्याय व्यवस्था को भी एक बड़ा इम्तिहान दिया।

Behera Murder Case राजनीति से रंजिश, और हत्या तक का रास्ता

रामचंद्र बेहरा एक अनुभवी और लोकप्रिय नेता थे। पहले कांग्रेस में थे, फिर 2014 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े। 2019 में वे बीजेडी (बीजू जनता दल) में शामिल होने वाले थे और एमएलसी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे।

25 मार्च की रात, बेहरा अपने घर में पत्नी और दो बेटियों के साथ रात का खाना खा रहे थे। तभी गांव के पाँच लोग – संजीव, अजीत, अरुण, अलेख और पुरन – उनके घर पहुंचे। सभी ने उनके पैर छुए और कहा, “अब आप बीजेडी में आ रहे हैं, आपका स्वागत है।” चाय-नाश्ते के दौरान बातचीत होती रही और कुछ देर बाद वे लौट गए।

लेकिन रात 10 बजे के आसपास वही लोग फिर से लौटे और बाहर से आवाज़ लगाई – “बेहरा जी, कुछ और लोग आपसे मिलना चाहते हैं।” जैसे ही बेहरा बाहर आए, उनके साथ जो हुआ वो किसी ने कभी सोचा भी नहीं था।

तलवारों और भालों से किया गया हमला

जैसे ही बेहरा मुख्य द्वार से बाहर निकले, उन पर डंडों से हमला किया गया। फिर अरुण ने तलवार निकाली और कहा – “चुनाव लड़ने का बहुत शौक है ना, आज सब खत्म कर देंगे।” उसने बेहरा का बायां हाथ काट दिया। खून चारों तरफ फैल गया। उनकी पत्नी और बेटियां बाहर भागीं लेकिन उन्हें भी जान से मारने की धमकी दी गई।

इसके बाद हमलावरों ने भालों से बेहरा के पेट, छाती और पैरों में हमला किया। अजीत ने तलवार से उनका दायां हाथ भी काट दिया और फिर दोनों पैर काटे गए। बेहरा ज़मीन पर तड़पते रहे।

गांव की चुप्पी और परिवार की चीखें

पत्नी प्रशांति और बेटियां मीनारानी और देबजानी किसी तरह से उन्हें उठाकर एक घंटे बाद आनंदपुर अस्पताल ले गईं। डॉक्टर ने प्राथमिक उपचार करके उन्हें कट्टक रेफर कर दिया। एम्बुलेंस से जब वे कट्टक की ओर जा रहे थे, रास्ते में ही बेहरा की सांसें थम गईं।

नर्स ने कहा – “अब उनका शरीर बर्फ जैसा हो गया है, कोई फायदा नहीं।” पूरा परिवार रोता-बिलखता वापस गांव लौट आया।

हत्या के बाद भी नहीं रुके दरिंदे

घटना के बाद भी आरोपियों का आतंक कम नहीं हुआ। संजीव, अजीत और प्रमोद गांव में मोटरसाइकिल से बेहरा का कटा हुआ हाथ लेकर घूमे और लोगों को धमकाया – “जो भी हमारे नेता के खिलाफ चुनाव लड़ेगा, उसका यही हाल होगा।”

फिर वे सभी जंगल की ओर भाग गए। वहां जाकर उन्होंने कटा हुआ हाथ दिखाते हुए वीडियो बनाया। प्रमोद ने उस हाथ को हवा में लहराया और खाने की कोशिश की। मोबाइल से वीडियो बनाकर व्हाट्सएप पर भेजा गया – “चुनाव लड़ोगे तो यही होगा।”

पुलिस जांच और सबूतों की बरामदगी

जैसे ही हत्या की खबर फैली, घसीपुरा थाना के सब-इंस्पेक्टर मनोरंजन बिसी अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे। उन्होंने देखा कि घर के बाहर खून से सनी मिट्टी, चप्पलें, और हथियार पड़े हैं। पुलिस ने तलवार, भाले और करीब 5 किलो खून से सनी मिट्टी जब्त की।

बेहरा की बेटी मीनारानी ने सभी आरोपियों की पहचान की और बताया कि वे सभी बीजेडी के कार्यकर्ता थे।

कोर्ट में चला मामला और 2019 में शुरू हुई सुनवाई

पुलिस ने IPC की धारा 302 (हत्या), 201 (सबूत नष्ट करना), और 120-B (षड्यंत्र) के तहत मामला दर्ज किया। साल 2019 में कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। कुल 53 गवाहों की गवाही ली गई, 94 दस्तावेज़ और 30 फिजिकल एविडेंस कोर्ट में पेश किए गए।

6 मार्च 2024 को आया ऐतिहासिक फैसला

6 मार्च 2024 को ओडिशा के आनंदपुर सत्र न्यायालय ने इस जघन्य हत्या के मामले में 5 आरोपियों को मृत्युदंड (Death Penalty) की सजा सुनाई।

जिन पांच को मौत की सजा दी गई, उनके नाम थे:

  • संजीव प्रुस्टी
  • अजीत प्रुस्टी
  • अरुण प्रुस्टी
  • अलेख प्रुस्टी
  • पुरन बैतई

छठा आरोपी प्रमोद नाबालिग था, इसलिए उसका ट्रायल किशोर न्याय बोर्ड में अलग चला।

न्यायाधीश ने इस मामले को “rarest of rare” की श्रेणी में माना और कहा कि — “यह हत्या सिर्फ राजनीति की नहीं थी, यह इंसानियत को शर्मसार करने वाली थी। अगर ऐसे मामलों में कठोर सजा नहीं दी जाएगी, तो समाज में न्याय की कोई जगह नहीं बचेगी।”

परिवार की प्रतिक्रिया और समाज में डर

रामचंद्र बेहरा की बेटी मीनारानी ने कोर्ट के फैसले के बाद कहा – “हमें सुकून मिला कि पापा के हत्यारों को सजा मिली, लेकिन उनके बिना जीवन कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।” गांव में आज भी लोग इस घटना को याद करके सहम जाते हैं।

Behera Murder Case राजनीति और हिंसा का खतरनाक गठजोड़

रामचंद्र बेहरा की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं थी। यह एक ऐसे नेता की चुप कराने की कोशिश थी, जो गांव की राजनीति में बदलाव ला सकता था। यह घटना बताती है कि जब सत्ता की भूख कानून और इंसानियत से ऊपर हो जाती है, तब ढकोटा जैसी घटनाएं जन्म लेती हैं।

अब जब कोर्ट ने मृत्युदंड की सजा सुनाई है, तो समाज को उम्मीद है कि शायद अब कोई और बेहरा राजनीति का शिकार न बने।


©द नेशन स्टोरी, 2025 (The Nation Story)
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