Nepal Social Media Ban : नेपाल की सरकार ने एक ऐतिहासिक और विवादास्पद फैसला लेते हुए देश में कई प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया है। इस कदम ने राजधानी काठमांडू समेत देश के प्रमुख शहरों में एक बवंडर खड़ा कर दिया है, जहाँ हज़ारों की संख्या में युवा, खासकर जनरेशन ज़ैड, सड़कों पर उतर आए हैं। हवा में गुस्सा है, नारेबाजी है और एक स्पष्ट सवाल है – क्या यह पाबंदी जनता की आवाज़ दबाने का एक तरीका है?
Nepal Social Media Ban : सरकार का दावा vs. जनता का गुस्सा
सरकार की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में Nepal Social Media Ban को “सामाजिक सद्भाव बनाए रखने” और “सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल पर रोक” लगाने के लिए जरूरी बताया गया है। प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की कैबिनेट ने यह फैसला लिया है।
सरकार का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करके लगातार अफवाहें फैलाई जा रही थीं, लोगों को भड़काया जा रहा था और सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाया जा रहा था। एक वरिष्ठ मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह एक अस्थायी कदम है। हम लोगों की सुरक्षा और देश की शांति सुनिश्चित करना चाहते हैं।”
लेकिन सड़कों पर मौजूद नौजवानों को सरकार का यह तर्क बिल्कुल पच नहीं रहा है।
“हमारी आवाज़ नहीं दबेगी!” – सड़कों पर उतरे हज़ारों युवा
Nepal Protest : सरकार के फैसले की खबर मिलते ही काठमांडू का मैदानगढ़ इलाका युवाओं के एक विशाल समूह में तब्दील हो गया। हाथों में बैनर, मुँह में नारे और चेहरों पर गुस्सा था। ये ज्यादातर 18 से 25 साल के युवा थे, जिनके लिए Social Media सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति, संवाद और दुनिया से जुड़े रहने का एकमात्र प्लेटफॉर्म है।
एक प्रदर्शनकारी, 22 वर्षीया सृष्टि, जो कि एक कॉलेज स्टूडेंट है, ने आवाज़ काँपते हुए कहा, “यह हमारी आजादी पर हमला है। हम टिकटॉक पर क्रिएटिविटी दिखाते थे, Instagram पर अपना बिजनेस चलाते थे, Facebook पर परिवार से जुड़े रहते थे। सरकार ने बिना कोई मौका दिए सब बंद कर दिया। क्या हम कोई अपराधी हैं?”
Generation Z का सवाल: क्या डिजिटल दुनिया पर पाबंदी है लोकतंत्र पर हमला?
यही सवाल हर युवा के जहन में है। आज का जनरेशन ज़ैड डिजिटल युग में पला-बढ़ा है। उनके लिए ऑनलाइन दुनिया और ऑफलाइन दुनिया के बीच कोई खास फर्क नहीं है। उनका मानना है कि इंटरनेट की आजादी लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है। Nepal Social Media Ban उन्हें एक तरह से ‘डिजिटल इमरजेंसी’ लग रहा है।
23 वर्षीय रोहित, जो एक छोटा सा डिजिटल मार्केटिंग का काम चलाता है, कहता है, Nepal Social Media Ban से मेरा पूरा कारोबार Instagram और Facebook पर टिका है। इस बैन ने मेरी रोजी-रोटी छीन ली है। सरकार कहती है कि अफवाहें फैल रही थीं, तो क्या पूरे शहर की बिजली काट देनी चाहिए क्योंकि एक बल्ब फ्यूज हो गया?
नेपाल प्रोटेस्ट: पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव, नेटवर्क धीमा
प्रदर्शन शांतिपूर्ण शुरू हुआ, लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, तनाव भी बढ़ता गया। पुलिस ने भारी संख्या में बैरिकेड्स लगा दिए हैं। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी। Nepal Social Media Ban को लेकर माहौल काफी तनावपूर्ण बना हुआ है।
लोगों ने यह भी शिकायत की है कि मोबाइल इंटरनेट की स्पीड जानबूझकर धीमी कर दी गई है, ताकि प्रदर्शनकारी आपस में तालमेल न बैठा पाएँ और लाइव स्ट्रीमिंग न कर पाएँ। यह एक ऐसी रणनीति है जिसे दुनिया भर में अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता देखा गया है।
Nepal Social Media Ban : क्या है नए नियम? VPN के इस्तेमाल पर क्या होगी कार्रवाई?
सरकार के आदेश के मुताबिक, टिकटॉक, Facebook, X (ट्विटर), Instagram और WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म्स तक पहुँच पर रोक लगा दी गई है। हालाँकि, दिलचस्प बात यह है कि YouTube जैसे प्लेटफॉर्म को इस सूची से बाहर रखा गया है।
इसके जवाब में, टेक-सेवी युवाओं ने VPN (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, जो उन्हें प्रतिबंधित साइट्स तक पहुँचने की अनुमति देता है। सरकार ने इसके जवाब में एक और चेतावनी जारी की है कि VPN का इस्तेमाल करना गैरकानूनी है और ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह फैसला एक नागरिक के निजता के अधिकार और सरकारी नियंत्रण के बीच एक नए विवाद को जन्म दे रहा है।
आज की ताज़ा खबर: सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई याचिका, सोशल मीडिया बैन को चुनौती
इस पूरे मामले ने एक कानूनी मोड़ ले लिया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं की एक टीम ने Nepal Social Media Ban को लेकर नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल की है। उनका तर्क है कि Nepal में Social Media Ban देश के संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
याचिका में कहा गया है, “सरकार एक ऐसा कानून लेकर आई है जो अनुपातहीन और मनमाना है। अफवाहों और दुरुपयोग से निपटने के लिए पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करना एक कुंद उपकरण का इस्तेमाल करने जैसा है। इसकी जगह, साइबर कानूनों को सख्ती से लागू करना और डिजिटल साक्षरता बढ़ाना चाहिए।”
अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार से जवाब माँगा है। अगले 24 से 48 घंटे इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
नेपाल में अशांति का दौर: दुनिया भर की नजरें काठमांडू पर टिकीं
Nepal Social Media Ban पूरे दक्षिण एशिया और दुनिया भर में चर्चा में है तथा अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने नेपाल सरकार के इस कदम की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि यह नागरिक अधिकारों पर एक गंभीर चोट है।
पड़ोसी देश भारत और चीन की नजरें भी इस घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। नेपाल की अंदरूनी राजनीति और स्थिरता का सीधा असाल पूरे क्षेत्र पर पड़ता है।
अगले 24 घंटे अहम
अभी स्थिति तेजी से बदल रही है। सरकार अपने रुख पर अड़ी हुई है, प्रदर्शनकारी पीछे हटने का नाम नहीं ले रहे हैं, और अदालत ने हस्तक्षेप किया है। यह देखना होगा कि क्या Nepal Social Media Ban पर सरकार बातचीत के लिए तैयार होती है या फिर और सख्ती दिखाती है। क्या सुप्रीम कोर्ट इस प्रतिबंध को असंवैधानिक ठहराएगा?
नेपाल का जनरेशन ज़ैड साबित कर चुका है कि वह सिर्फ एक ‘स्क्रीन की पीढ़ी’ नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों के लिए लड़ने और देश के भविष्य की दिशा तय करने में उसकी एक स्पष्ट और मजबूत आवाज़ है। Nepal Social Media Ban सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक पुरानी पीढ़ी और नए डिजिटल युग के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है।
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©द नेशन स्टोरी, 2025 (The Nation Story)
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